Sunday, 15 January 2023

करूँ मैं क्या करूँ?

बहुत दिनों से इसी तरह के विचार मन में चल रहे हैं। कौन जानता है कितना समय है मेरे पास? क्या अगर कल भगवान आते हैं और कहते हैं, "चलो!", तो क्या मैं ख़ुशी-ख़ुशी जा सकूँगा? या मन में कुछ पश्चाताप, कुछ असंतोष रहेगा? क्या मैंने वो सब कर लिया है- जो मैं करना चाहता था? क्या मुझे पता भी है कि आखिर मैं करना क्या चाहता था?

कई बार आप जिस तरह के विचार रखते हैं, उसी तरह की चीजें आप की तरफ attract होती हैं। शायद इसी वजह से एक बुक की तरफ attract हुआ "The Top Five Regrets of the Dying". कुछ और ऐसे ही videos YouTube पर भी दिखे।

कुल मिलाकर सच यही है कि अंत निश्चित है। घड़ी लगातार चल रही है। समय सबके पास सीमित है।  

समय कितना है नहीं पता। पर जितना भी है क्या उसका सदुपयोग हो सकता है? क्या बचे समय में वो सब किया जा सकता है जो वाकई में करना चाहिये? पर कैसे पता चले कि मुझे क्या करना चाहिये ?

निश्चित ही 10-5 जॉब तो नहीं करना। Tax, Bills, Loans, EMIs, Premiums ही नहीं pay करते रहना है। अगर 15 साल काम करना है तो 2000 घंटे हर साल के हिसाब से 30000 घंटे काम करना है, जो कुल मिला कर जीवन के 3.5 साल होते हैं। क्या इस समय को वो काम करते हुए बिताना है, जिसको करने से शायद जीवन के असली उद्देश्य को achieve करने में कोई फायदा नहीं। 

फिर? फिर आखिर मुझे करना क्या है?


Friday, 25 August 2017

॥ जय श्री गणेश ॥

॥ जय श्री गणेश ॥ जय सरस्वती माँ ॥ जय श्री राम ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥


भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा मंगलवार विक्रम संवत् 2074
  - 22 अगस्त 2017


मैं कुछ लिखना चाहता हूँ | अपने जो भी विचार हैं उन्हें शब्दों में उतारना चाहता हूँ | एक ही काम तो है जो बचपन से बहुत अच्छे से करता आया हूँ और आज भी उतने ही अच्छे से करता हूँ – सोचने का| घंटों अपने सोच विचारों में खोया रहा करता था और आज भी समय मिलते ही अपनी सोच में डूब जाना पसंद करता हूँ | कहते हैं एक सामान्य मनुष्य के मस्तिष्क में एक दिन में लगभग 60 हजार विचार आते हैं | आज जन्म के लगभग 15 हजार दिन बीत चुके हैं और इस बीच लगभग 90 करोड़ से भी ज्यादा विचार मेरे मस्तिष्क से गुजर चुके हैं | कभी इन में से किसी भी विचार को नोट नहीं किया | आज याद करने बैठता हूँ तो याद ही नहीं आता कि इन 90 करोड़ विचारों में क्या क्या सोचता रहा | इसलिए चाहता हूँ कि इन विचारों में से कुछ ख़ास को याद करूँ और नोट करू |

मुझे ज्यादा बोलना कभी पसंद नहीं रहा इसलिए मेरे आसपास भी बहुत कम ऐसे लोग रहे हैं जो ये जानते होंगे कि मेरे दिमाग में क्या चलता रहा है | लेकिन किसी और को बताने के बजाय खुद ये हिसाब किताब रखना चाहता हूँ कि मैंने इतने सालों में क्या किया या क्या सोचा |

कुछ धुंधली सी याद है कि मैंने शायद पांचवी या छठी कक्षा से बहुत ज्यादा सोचना शुरू किया | बहुत बड़े बड़े विचार हुआ करते थे, बड़े बड़े सपने, बड़ी बड़ी महत्वाकांक्षाएं | सारी दुनिया को बदल देना चाहता था और उसके लिए बहुत सारे उपाय भी हुआ करते थे | सबके लिए ऐसा आदर्श बनना चाहता था, ऐसा जीवन जीना चाहता था जिसका लोग अनुसरण कर सकें | ये सब 90 करोड़ विचार बस विचार ही रहे | कभी कुछ किया नहीं | अब सोचता हूँ कम से कम इन्हें लिख तो लूँ | क्या पता कहीं काम आ जायें |

इन 15 हज़ार दिनों में बहुत से सवाल रहे मन में | मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ, मैं जहाँ हूँ वहाँ क्यों हूँ? मेरे साथ में जो भी हैं वो कौन हैं, वो मेरे साथ क्यों हैं? जो आज साथ नहीं हैं उन्हें क्यों मेरे जीवन में लाया गया था? संसार में इतने संघर्ष क्यों हैं, दुःख क्यों हैं, दर्द, बीमारी, अज्ञान, गरीबी, भटकाव क्यों है? क्या इनसे निकलने का कोई उपाय है और अगर है तो क्या है? संसार क्यों चल रहा है? क्या इसे कोई चलाने वाला है या ये अपने आप ही चल रहा है? इन सबके जवाब ढूँढने के लिए कई किताबें पढ़ीं, अपने बड़ों से चर्चा की, धर्मगुरुओं और महापुरुषों को सुना, पढ़ा | कई सवालों के जवाब मिले कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं | ज्ञान प्राप्ति तो एक यात्रा है जो जीवन पर्यंत जारी रहेगी, रहनी भी चाहिए| परन्तु अब महसूस होता है कि आगे और जानने से पहले जरुरी है कि जो समझ चुका हूँ उसे संकलित करूँ और व्यवस्थित करूँ |

अपने ईश्वर, देवी देवताओं, सभी पूर्वजों, माता-पिता और बड़ों को प्रणाम करके अपनी यात्रा प्रारंभ करना चाहता हूँ | 

॥ ॐ ॥

मैं और अमिताभ बच्चन ... (माया क्या है?)

मैं और अमिताभ बच्चन

(माया क्या है?)

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी बुधवार विक्रम संवत् 2074                           25 अगस्त 2017

माया की एक बहुत ही सरल परिभाषा कहीं पढ़ी थी | “दृष्टा और दृश्य में भेद बताने वाली शक्ति को ही माया कहते हैं |” दृष्टा अर्थात जो देख रहा है | दृश्य अर्थात जो दिख रहा है | जिस शक्ति की वजह से ‘जो देख रहा है’ वह अपने आप को ‘जो दिख रहा है’ उससे अलग मानता है वही माया है | मैं जब अपने आप को हाथ, पैर, सिर और धड़ वाला ये शरीर मानने लगता हूँ और इस शरीर के बाहर जो कुछ भी है उसे मुझसे अलग मानने लगता हूँ, उसे ही माया कहते हैं |
कहते हैं – जो पहले था और जो बाद में होगा वही आज भी है | जिस शक्ति की वजह से आज वह  अलग दिखाई देता है वही माया है | जैसे जब हम किसी खेत जाते हैं जहाँ छोटे छोटे पौघे लहलहा रहे हों | अगर हम किसान से पूछें ये किस चीज का खेत है? तो किसान कहता है गेहूं का खेत है | लेकिन अभी गेहूं तो कहीं दिखाई नहीं दे रहे, फिर यह गेहूं का खेत कैसे हुआ? जो बोया गया था वह गेहूं था और फसल पकने के बाद जो प्राप्त होगा वह गेहूं होगा किन्तु आज तो कहीं गेहूं नहीं है, फिर यह गेहूं का खेत कैसे हुआ | चूँकि जो पहले था और जो बाद में होगा वही आज भी है, इसी वजह से आज भी हम कहते हैं कि यह गेहूं का खेत है |
इसी तरह जैसे कुम्हार मिट्टी से घड़े, सुराही, और गमले बनाता है | बनने से पहले भी ये सब मिट्टी  थे और टूटने के बाद भी ये सब मिट्टी हो जायेंगे | अतः वास्तविकता में आज भी ये सब मिट्टी ही हैं | जिस शक्ति की वजह से ये सब आज हमें घड़े, सुराही और गमले अलग अलग दिखाई देते हैं, वही शक्ति माया है |
अगर हम भौतिक विज्ञान की दृष्टि से देखें तो लगभग 1380 करोड़ वर्ष पहले सारा संसार केवल आग का एक गोला था | ये पृथ्वी, चाँद, सितारे, सौर मंडल, आकाश गंगाएं कुछ भी नहीं थे | मनुष्य, जीव-जंतु, पेड़ पौघे होने का तो सवाल ही नहीं उठता | अगर कुछ था तो बस आग का एक गोला | फिर किसी नियत समय पर इसने फैलना और ठंडा होना प्रारंभ किया, जो आज भी सतत जारी है | इसी प्रक्रिया को विज्ञान की भाषा में बिग बैंग (Big Bang) कहते हैं | इसी आग के गोले से ही समस्त आकाशगंगाओं, सौरमंडल, पृथ्वी और अंतत: मनुष्य, जीव-जंतुओं एवं पेड़ पौधों की उत्पत्ति हुई | इसी के ठीक उलट Big Crunch थ्योरी कहती है की किसी एक नियत समय पर यह फैलना और ठंडा होना रुकेगा और धीरे धीरे समस्त संसार पुनः आग के उस गोले में परिवर्तित हो जायेगा |
अत: अगर हम विज्ञान की मानें तो हम सब मनुष्य - मैं, आप सब और यहाँ तक कि अमिताभ बच्चन भी कभी एक ही थे – आग का एक विशाल गोला | और आने वाले कई वर्षो बाद भी हम सब एक ही हो जायेंगे - फिर वही आग का एक विशाल गोला | अतः जो पहले था और जो बाद में होगा वही आज भी है | जैसे हम सब पहले एक थे आगे भी हम सब एक ही होंगे उसी तरह आज भी हम सब एक ही हैं | जिस शक्ति की वजह से आज हम सब अलग अलग दिखाई देते हैं वही माया है |
इसी तरह अगर अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो जब संसार में कुछ भी नहीं था तब सिर्फ परमपिता परमेश्वर थे | उसी परमात्मा से सभी आत्माओं की उत्पत्ति हुई है | और अपना अपना किरदार निभाने के बाद हम सब पुन: उसी परमात्मा में समाहित हो जायेंगे | अत: मैं, आप सब यहाँ तक कि अमिताभ बच्चन भी अध्यात्म की दृष्टि से कभी एक ही थे | और आगे भी हम सब उसी एक ही हो जायेंगे | अत: जो पहले था और जो बाद में होगा वही आज भी है | अर्थात हम सब अध्यात्म की दृष्टि से भी जैसे हम सब पहले एक थे आगे भी एक ही होंगे, उसी तरह आज भी हम सब एक ही हैं |

क्या हिन्दू क्या मुस्लिम, क्या ब्राम्हण क्या शूद्र, क्या गोरा किया काला, क्या पुरुष क्या स्त्री, क्या जड़ क्या चेतन – हम सब एक ही हैं | माया का यह साधारण सा सिद्धांत अगर हम सब समझ जायें, तो संसार की बहुत सारी समस्यायें बहुत सारे झगड़े आसानी से सुलझ सकते हैं |

Saturday, 20 October 2012

श्री गणेश स्तुति - गणनायकाय गणदेवताय


जय सरस्वती माँ




या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता 
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। 
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता 
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं 
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌। 
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌ 
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥


जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें॥1॥
शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ॥2॥